आज कल कोई भाव ही नहीं उठता मेरे मन में
हाँ कभी कभी एक धुआं से निकलता है कुछ
जो पसर जाती है मेरे ऊपर के आकाश में
और नहीं देखने देती मुझे चाँद या सूरज.
देख सकता हूँ कुछ तो बस पैरों के नीचे दबी जमीन,
जोड़ से दबा रखा है और घुसा रखे हैं पैरों के नाखून.
कि कहीं खो न जाये बचा हुआ एक टुकरा जमीन
जिसे पुरखों ने बड़े ही जतन से संजोया था.
आखिरी बार जाने से पहले कह गए थे दादी से
और तुम देखोगी उन्हें राज करते अपने देश में.
पर अफसोस उन्हें हमारा विकास गंवारा न था
तभी तो चल बसी वो हमें नेता बनते देख कर.
कभी खुली सड़क पर कत्ल होते नहीं देखा
ना ही देखा किसी कि अस्मत मोहल्ले में लुटते हुए
राशन की कतारों पर गोलियां चलती भी नहीं देखी
उन्हें क्या पता कि आजादी क्या है.
उन्हें क्या मालूम उत्तर - दक्षिण का फर्क
नहीं पता उन्हें तो धर्म, जाति व भाषा के भेद.
ना ही मालूम उन्हें कि भाषण का नया तरीका
जो देती है छूट हमको अपने मन का बोलने का.
खुद तो पढ़े थे बस कुल जमां आठ
फिर तो लग गए थे वे उन बुरे लोगों के साथ.
जिन्होंने पकरा दिया बन्दूक उनके हाथ
और भर दिया जहर उनके पैर से माथ.
नहीं तो आज वे जरूर कहीं के सांसद होते
और हमारे ढेरों पेट्रोल पम्प और ठेके होते.
होती हमारी एक क्षेत्रीय पार्टी भी यहीं
और आते हर चुनाव में माल हमारे हाथ.
मर गए खुद इसी आजादी का काम ले कर
जीते रहे सुबहो शाम जिसका नाम ले कर.
और हम जो करें मजे इस आजादी के
तो चिढाते लोग हमें उन्ही का नाम ले कर.
Saturday, April 11, 2009
एकांतवास में हड़बड़ी
आज कल मैं एकांतवास में हूँ.
इसलिए नहीं कि मैं उदास हूँ या कर रहा हूँ कोई साधना.
दरअसल मायके गयी हैं मेरी प्यारी ‘भावना’.
हर पति-पत्नी का रिश्ता भी बड़ा अजीब है.
उनकी दूरी से ही पता चलता है वे कितने करीब हैं.
यह सुख कहें या दुःख, मिलना भी एक नसीब है.
यह सिर्फ मैं नहीं हर जोड़ा जानता है.
शादी कर के खुश है यह फिर भी कहाँ मानता है.
सुख को दुःख या फिर उल्टा ही कह रहा जानता है.
दोस्तों, सहकर्मियों ने भी शुरू कर दी हैं चुटकियाँ
ऐसी आजादी हर किसी को बार बार नहीं मिलती.
यार तेरी तो लाटरी लगा गयी ये छुट्टियाँ, “ऐश कर”.
“ऐश” क्या बंदा तो बिपाशा मल्लिका को भी तैयार है.
पर उसकी वापसी पर कैसे कहूँगा कि तुमसे मुझको प्यार है.
फिर सोचता हूँ उनका क्या, एक गया तो दूसरा यार तैयार है.
अभी भी पड़ा हूँ बिस्तर पर उसके इंतजार में
शायद अभी कहेगी “अब उठो भी चाय तैयार है”.
अरे बाप रे, नौ बज गए और मैं बैठा हूँ जैसे इतवार है.
इसलिए नहीं कि मैं उदास हूँ या कर रहा हूँ कोई साधना.
दरअसल मायके गयी हैं मेरी प्यारी ‘भावना’.
हर पति-पत्नी का रिश्ता भी बड़ा अजीब है.
उनकी दूरी से ही पता चलता है वे कितने करीब हैं.
यह सुख कहें या दुःख, मिलना भी एक नसीब है.
यह सिर्फ मैं नहीं हर जोड़ा जानता है.
शादी कर के खुश है यह फिर भी कहाँ मानता है.
सुख को दुःख या फिर उल्टा ही कह रहा जानता है.
दोस्तों, सहकर्मियों ने भी शुरू कर दी हैं चुटकियाँ
ऐसी आजादी हर किसी को बार बार नहीं मिलती.
यार तेरी तो लाटरी लगा गयी ये छुट्टियाँ, “ऐश कर”.
“ऐश” क्या बंदा तो बिपाशा मल्लिका को भी तैयार है.
पर उसकी वापसी पर कैसे कहूँगा कि तुमसे मुझको प्यार है.
फिर सोचता हूँ उनका क्या, एक गया तो दूसरा यार तैयार है.
अभी भी पड़ा हूँ बिस्तर पर उसके इंतजार में
शायद अभी कहेगी “अब उठो भी चाय तैयार है”.
अरे बाप रे, नौ बज गए और मैं बैठा हूँ जैसे इतवार है.
१० पटाखे
१) एक सच्चे संगीत प्रेमी की पहचान क्या है?
जब एक आदमी एक औरत को बाथरूम में गाते सुनता है और फिर दरवाजे के छेद में आँख की बजाय कान लगा देता है.
२) हाईवे पर भैंस पर चढ़ कर जाते हुए एक व्यक्ति को ट्रैफिक हवालदार ने रोका, हेलमेट कहाँ है? जुरमाना लगेगा.
भैंससवार बोला: ध्यान से नीचे देख फोरव्हीलर है.
३) कंजूसी की हद क्या है?
सेकंड हैण्ड नैनो जिसमे गैस किट लगा हो खरीदने का इस्तहार देना.
४) शिक्षक: राहुल शराब नहीं पीता, इसमें राहुल क्या है?
विद्यार्थी: राहुल गधा है.
५) १० प्रतिशत दुर्घटनाएं शराब पीकर चलने से होती है. तो साबित होता है कि शराब नहीं पीने से ९० प्रतिशत दुर्घटनाएं होती हैं.
६) चांदनी रात थी, नदी का किनारा था, आसमान में तारों का नजारा था ऐसे में नौकर ने नौकरानी से कहा “आ बीड़ी पी ले”.
७) एक नर्स साक्षात्कार देने आयी.
डॉक्टर: कितनी तनख्वाह चाहिए?
नर्स: बारह हजार.
डॉक्टर: माई प्लेजर
नर्स: फिर तो २५ हजार
८) तुम्हारी गर्लफ्रेंड का एस एम् एस मिला है कहती है कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाना को ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी है बोम्ब से उड़ा दो साले को.
९) जीजा: साली जी, आपके यहाँ कि सबसे मशहूर चीज़ कौनसी है?
साली: जीजा जी, जो मशहूर थी, उसे तो आप ले गए!
१०) केमिस्ट्री की क्लास में शिक्षक ने पुछा नाईटरेट क्या है. लडकी बोली वह दिन का दुगुना है.
मजाक हो गया अब कुछ सीरियस बातें. फालतू मेल फॉरवर्ड मत कीजिये. मैं ऐसे इमेल न फॉरवर्ड करता हूँ न करने की सलाह देता हूँ. वास्तव में हैवी फोर्वार्ड्स एक सोची समझी साजिश के तहत शुरू होती है जिसका उद्देश्य होता है इन्टरनेट को चोक (जाम) करना. और हम में से बहुत इस काम में इस कुकृत्य में मदद करते हैं. बिना यह जाने कि यह हमारे नुक्सान के लिए ही बनाया गया है. इन्टरनेट धीमा होगा या बंद होगा तो हमारे काम धीमे चलेंगे. और हम जैसे लाखों लोगों का नुक्सान होगा, जो कि ऐसे फॉरवर्ड बानने वाले चाहते हैं.
जब एक आदमी एक औरत को बाथरूम में गाते सुनता है और फिर दरवाजे के छेद में आँख की बजाय कान लगा देता है.
२) हाईवे पर भैंस पर चढ़ कर जाते हुए एक व्यक्ति को ट्रैफिक हवालदार ने रोका, हेलमेट कहाँ है? जुरमाना लगेगा.
भैंससवार बोला: ध्यान से नीचे देख फोरव्हीलर है.
३) कंजूसी की हद क्या है?
सेकंड हैण्ड नैनो जिसमे गैस किट लगा हो खरीदने का इस्तहार देना.
४) शिक्षक: राहुल शराब नहीं पीता, इसमें राहुल क्या है?
विद्यार्थी: राहुल गधा है.
५) १० प्रतिशत दुर्घटनाएं शराब पीकर चलने से होती है. तो साबित होता है कि शराब नहीं पीने से ९० प्रतिशत दुर्घटनाएं होती हैं.
६) चांदनी रात थी, नदी का किनारा था, आसमान में तारों का नजारा था ऐसे में नौकर ने नौकरानी से कहा “आ बीड़ी पी ले”.
७) एक नर्स साक्षात्कार देने आयी.
डॉक्टर: कितनी तनख्वाह चाहिए?
नर्स: बारह हजार.
डॉक्टर: माई प्लेजर
नर्स: फिर तो २५ हजार
८) तुम्हारी गर्लफ्रेंड का एस एम् एस मिला है कहती है कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाना को ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी है बोम्ब से उड़ा दो साले को.
९) जीजा: साली जी, आपके यहाँ कि सबसे मशहूर चीज़ कौनसी है?
साली: जीजा जी, जो मशहूर थी, उसे तो आप ले गए!
१०) केमिस्ट्री की क्लास में शिक्षक ने पुछा नाईटरेट क्या है. लडकी बोली वह दिन का दुगुना है.
मजाक हो गया अब कुछ सीरियस बातें. फालतू मेल फॉरवर्ड मत कीजिये. मैं ऐसे इमेल न फॉरवर्ड करता हूँ न करने की सलाह देता हूँ. वास्तव में हैवी फोर्वार्ड्स एक सोची समझी साजिश के तहत शुरू होती है जिसका उद्देश्य होता है इन्टरनेट को चोक (जाम) करना. और हम में से बहुत इस काम में इस कुकृत्य में मदद करते हैं. बिना यह जाने कि यह हमारे नुक्सान के लिए ही बनाया गया है. इन्टरनेट धीमा होगा या बंद होगा तो हमारे काम धीमे चलेंगे. और हम जैसे लाखों लोगों का नुक्सान होगा, जो कि ऐसे फॉरवर्ड बानने वाले चाहते हैं.
दो डील: भगवान से
धरती पर यह परम्परा रही है कि जो भी व्यक्ति मर जाये उसे स्वर्गवासी डिक्लेयर कर दिया जाय. अभी तक तो यमराज जी ने भी लोगों की इच्छा का सम्मान रखते हुए सबको स्वर्ग ही भेजा. फलतः स्वर्ग लगभग हाउसफुल होने को था, सीटें कम बचीं थी और सीटों के बढ़ने की तब तक सम्भावना न थी जब तक कुछ लोग स्वयं पुनर्जन्म ले कर जगह खाली न कर दें. सरकारी व्यवस्था पर ऐश करना सबको अच्छा लगता है फिर भगवानी व्यवस्था तो इस से लाखों गुना बेहतर है.
अब भरते हुए स्वर्ग को देख यमराज ने मंत्रियों को पूछा कि यदि स्वर्ग का विस्तार करना संभव है तो उत्तर नकारात्मक मिला. यमराज ने मनुष्यों के अभियांत्रिकी और योजना की दुहाई और कुछ उदहारण भी दिए कि “देखो कैसे दिल्ली को बढा कर के एन सी आर तक ले गए, कैसे बंगलूरु को पहले बृहत् बंगलूरु और अब बंगलूरु मेट्रोपोलिटन रीजन बना रहे हैं. जो कुछ दिन में पूरा बंगलूरु जो जायेगा. अब तो छोटे-छोटे शहरों का भी विस्तार कर रहे हैं. गावों को शहर में विलीन कर शहर बनाये जा रहे हैं. और एक आप हैं कि स्वर्ग का विस्तार नहीं कर सकते”?
विश्वकर्मा: प्रभु विस्तार करना तकनीकी रूप से संभव है यदि नर्क के कुछ हिस्से को स्वर्ग में मिला दिया जाये. हमारे पास और कोई जगह तो है नहीं.
बीच में वृहस्पति बोल पड़े: प्रभु स्वर्गवासी आन्दोलन पर उतर आएंगे. नर्क में कुछ गिने चुने हैं उन्हें ज्यादा विरोध न होगा. हाँ उनमे से कुछ अपने अधिपत्य खोने के दर से विरोध करें, पर उन्हें भी नर्क के बदले स्वर्ग का लालच शांत कर देगा. स्वर्ग्वासीयों को भी स्वर्ग के नाम पर विचरने के लिए और जगह मिलेगी तो वे भी खुश रहेंगे.
कुबेर: प्रभु धन की समस्या आ जायेगी, नर्क के एक हिस्से को स्वर्ग बनाने में जो धन लगेगा अभी अपने खजाने में उतना भी नहीं है. प्रभु से अनुरोध है कि ऐसी योजना पर ध्यान न दें.
यमराज: और भक्तगण जो चढावा देते हैं वो?
कुबेर: अमूमन तो कोई आपके खाते में कुछ दान करता नहीं. बाकी देवताओं के नाम जो चढाये जाते हैं उसमे पुजारियों का हिस्सा देने के बाद उनके स्वयं की योजनाओं के लिए कम पड़ता है.
तभी नारद जी बोल पड़े:: प्रभु मेरे पास एक उपाय है जो मैं आप ही को बताना चाहता हूँ.
यमराज: कृपया हमें एकांत में छोड़ दिया जाय…..(और नारद से मंत्रणा करने लगते हैं. थोड़ी देर बाद दोनों मंद मंद मुस्काते हुए एक दुसरे से विदा लेते हैं).
अगले दिन दरबार में एक आदमी, जो एच आर मैनेजर था, मर कर यमराज के दरबार पहुंचा. यमराज ने पूछा “तुम कहाँ जाना चाहोगे वत्स, स्वर्ग या नर्क परन्तु ध्यान रहे कि निर्णय बदला नहीं जा सकता “? आदमी चकराया, प्रभु ने आप्शन दिया है, ऐसा कैसे हो सकता है, चलो जो भी हो स्वर्ग ही मांग लेता हूँ. बोला “स्वर्ग”. यमराज बोले “अरे नहीं, इतनी जल्दी नहीं पहले एक बार स्वर्ग और नर्क दोनों देख आओ, फिर आराम से अपना विचार हमें बता देना”.
दूत उसे पहले नर्क ले गया, वहां देखता है कि सभी आदमी-औरत नए-नए कपडे पहन कर इधर-उधर घूम रहे हैं. कहीं पकवाने तली और परोसी जा रही हैं, कहीं नाच गाना हो रहा है, कहीं लोग आपस में ठिठोली कर रहे हैं, कहीं शराब और खाना परोसा जा रहा है, कहीं कैबरे, कहीं डिस्को. शोर शराबा और पूरा पार्टी जैसा माहौल था और वातावरण (क्लाइमेट) भी बड़ा ही आरामदायक था.
फिर दूत उसे स्वर्ग ले गया. वहां देखता है कि सभी लोग सफ़ेद कपड़े पहने हुए शांति से बैठे हैं. कोई पूजा कर रहा है, कोई ध्यान कर रहा है, कोई प्रकृति की सुन्दरता को निहारे जा रहा हा है. स्त्रियाँ स्वेत वस्त्रों में मोतियों की माला पहने इधर से उधर घूम रही हैं, को शास्त्रीय संगीत गा रही हैं, कोई नृत्य कर रही हैं. सब अपने आप में मगन हैं. कोई किसी से बात नहीं करता. वातावरण यहाँ शांत और सुन्दर है पर यहाँ उत्सव जैसा नहीं बल्कि किसी सुबह सुबह मंदिर के जाप करने समय जैसा दृश्य हो रखा है.
अब उसे निर्णय लेना था. उसने सोचा मौसम तो दोनों जगह एक ही जैसा है. खाने,पीने, रहने और मनोरंजन वगैरह की भी दोनों जगह उत्तम व्यवस्था है. पर नर्क में चहल-पहल है और स्वर्ग में बोरियत. यहाँ कौन धरती से देखने आ रहा कि मैं नर्क में हूँ या स्वर्ग में. सो उसने निर्णय कर लिया वह नर्क ही चुनेगा और अगले दिन उसने अपना निर्णय यमराज को सुना दिया. यमराज भी प्रसन्न हो कर बोले “तथास्तु” और उसे नर्क भेज दिया.
अगले दिन जब वह नर्क पहुंचा तो वहां पहले जैसा कोई दृश्य न था, लोग फटे-पुराने कपडे पहन कर भिखारियों से हालत में मार खा खा कर काम कर रहे थे. वह दंग रह गया और दौर कर दूत के पास पहुंचा. मुझे यमराज जी से अभी के अभी मिलना है. दूत ने उसे दरबार भेज दिया. उसने यमराज से कहा: प्रभु मेरे साथ छल हुआ. पहले दिन तो नर्क बहुत ही मस्ती भरा था और अब….(रोने लगा). यमराज ने कहा “तब हम तुम्हे हायर कर रहे थे”.
-X-
पार्किंग स्पेस
एक आदमी साक्षात्कार देने देर से पहुंचा, परन्तु कोई भी पार्किंग स्पेस उसे खाली न मिला. अब घबराहट में उसने भगवन से विनती शुरू की. हे भगवन यदि मुझे अभी के अभी पार्किंग स्पेस मिल जाता है तो मैं शराब पीना छोड़ दूंगा और प्रत्येक रविवार को मंदिर भी जाऊँगा. तभी अचानक से एक पार्किंग स्पेस उसे मिल भी गया.
उसने ऊपर देखा और कहा “आप रहने दें, मुझे मिल गया”.
अब भरते हुए स्वर्ग को देख यमराज ने मंत्रियों को पूछा कि यदि स्वर्ग का विस्तार करना संभव है तो उत्तर नकारात्मक मिला. यमराज ने मनुष्यों के अभियांत्रिकी और योजना की दुहाई और कुछ उदहारण भी दिए कि “देखो कैसे दिल्ली को बढा कर के एन सी आर तक ले गए, कैसे बंगलूरु को पहले बृहत् बंगलूरु और अब बंगलूरु मेट्रोपोलिटन रीजन बना रहे हैं. जो कुछ दिन में पूरा बंगलूरु जो जायेगा. अब तो छोटे-छोटे शहरों का भी विस्तार कर रहे हैं. गावों को शहर में विलीन कर शहर बनाये जा रहे हैं. और एक आप हैं कि स्वर्ग का विस्तार नहीं कर सकते”?
विश्वकर्मा: प्रभु विस्तार करना तकनीकी रूप से संभव है यदि नर्क के कुछ हिस्से को स्वर्ग में मिला दिया जाये. हमारे पास और कोई जगह तो है नहीं.
बीच में वृहस्पति बोल पड़े: प्रभु स्वर्गवासी आन्दोलन पर उतर आएंगे. नर्क में कुछ गिने चुने हैं उन्हें ज्यादा विरोध न होगा. हाँ उनमे से कुछ अपने अधिपत्य खोने के दर से विरोध करें, पर उन्हें भी नर्क के बदले स्वर्ग का लालच शांत कर देगा. स्वर्ग्वासीयों को भी स्वर्ग के नाम पर विचरने के लिए और जगह मिलेगी तो वे भी खुश रहेंगे.
कुबेर: प्रभु धन की समस्या आ जायेगी, नर्क के एक हिस्से को स्वर्ग बनाने में जो धन लगेगा अभी अपने खजाने में उतना भी नहीं है. प्रभु से अनुरोध है कि ऐसी योजना पर ध्यान न दें.
यमराज: और भक्तगण जो चढावा देते हैं वो?
कुबेर: अमूमन तो कोई आपके खाते में कुछ दान करता नहीं. बाकी देवताओं के नाम जो चढाये जाते हैं उसमे पुजारियों का हिस्सा देने के बाद उनके स्वयं की योजनाओं के लिए कम पड़ता है.
तभी नारद जी बोल पड़े:: प्रभु मेरे पास एक उपाय है जो मैं आप ही को बताना चाहता हूँ.
यमराज: कृपया हमें एकांत में छोड़ दिया जाय…..(और नारद से मंत्रणा करने लगते हैं. थोड़ी देर बाद दोनों मंद मंद मुस्काते हुए एक दुसरे से विदा लेते हैं).
अगले दिन दरबार में एक आदमी, जो एच आर मैनेजर था, मर कर यमराज के दरबार पहुंचा. यमराज ने पूछा “तुम कहाँ जाना चाहोगे वत्स, स्वर्ग या नर्क परन्तु ध्यान रहे कि निर्णय बदला नहीं जा सकता “? आदमी चकराया, प्रभु ने आप्शन दिया है, ऐसा कैसे हो सकता है, चलो जो भी हो स्वर्ग ही मांग लेता हूँ. बोला “स्वर्ग”. यमराज बोले “अरे नहीं, इतनी जल्दी नहीं पहले एक बार स्वर्ग और नर्क दोनों देख आओ, फिर आराम से अपना विचार हमें बता देना”.
दूत उसे पहले नर्क ले गया, वहां देखता है कि सभी आदमी-औरत नए-नए कपडे पहन कर इधर-उधर घूम रहे हैं. कहीं पकवाने तली और परोसी जा रही हैं, कहीं नाच गाना हो रहा है, कहीं लोग आपस में ठिठोली कर रहे हैं, कहीं शराब और खाना परोसा जा रहा है, कहीं कैबरे, कहीं डिस्को. शोर शराबा और पूरा पार्टी जैसा माहौल था और वातावरण (क्लाइमेट) भी बड़ा ही आरामदायक था.
फिर दूत उसे स्वर्ग ले गया. वहां देखता है कि सभी लोग सफ़ेद कपड़े पहने हुए शांति से बैठे हैं. कोई पूजा कर रहा है, कोई ध्यान कर रहा है, कोई प्रकृति की सुन्दरता को निहारे जा रहा हा है. स्त्रियाँ स्वेत वस्त्रों में मोतियों की माला पहने इधर से उधर घूम रही हैं, को शास्त्रीय संगीत गा रही हैं, कोई नृत्य कर रही हैं. सब अपने आप में मगन हैं. कोई किसी से बात नहीं करता. वातावरण यहाँ शांत और सुन्दर है पर यहाँ उत्सव जैसा नहीं बल्कि किसी सुबह सुबह मंदिर के जाप करने समय जैसा दृश्य हो रखा है.
अब उसे निर्णय लेना था. उसने सोचा मौसम तो दोनों जगह एक ही जैसा है. खाने,पीने, रहने और मनोरंजन वगैरह की भी दोनों जगह उत्तम व्यवस्था है. पर नर्क में चहल-पहल है और स्वर्ग में बोरियत. यहाँ कौन धरती से देखने आ रहा कि मैं नर्क में हूँ या स्वर्ग में. सो उसने निर्णय कर लिया वह नर्क ही चुनेगा और अगले दिन उसने अपना निर्णय यमराज को सुना दिया. यमराज भी प्रसन्न हो कर बोले “तथास्तु” और उसे नर्क भेज दिया.
अगले दिन जब वह नर्क पहुंचा तो वहां पहले जैसा कोई दृश्य न था, लोग फटे-पुराने कपडे पहन कर भिखारियों से हालत में मार खा खा कर काम कर रहे थे. वह दंग रह गया और दौर कर दूत के पास पहुंचा. मुझे यमराज जी से अभी के अभी मिलना है. दूत ने उसे दरबार भेज दिया. उसने यमराज से कहा: प्रभु मेरे साथ छल हुआ. पहले दिन तो नर्क बहुत ही मस्ती भरा था और अब….(रोने लगा). यमराज ने कहा “तब हम तुम्हे हायर कर रहे थे”.
-X-
पार्किंग स्पेस
एक आदमी साक्षात्कार देने देर से पहुंचा, परन्तु कोई भी पार्किंग स्पेस उसे खाली न मिला. अब घबराहट में उसने भगवन से विनती शुरू की. हे भगवन यदि मुझे अभी के अभी पार्किंग स्पेस मिल जाता है तो मैं शराब पीना छोड़ दूंगा और प्रत्येक रविवार को मंदिर भी जाऊँगा. तभी अचानक से एक पार्किंग स्पेस उसे मिल भी गया.
उसने ऊपर देखा और कहा “आप रहने दें, मुझे मिल गया”.
निकला न करो घर से अपने ऐ दोस्त
मालूम है तुम्हे गोरैया नहीं देती अंडे पुराने घोंसलों में.
पर इंसान एक ही घर, एक ही जगह जिन्दगी देता है गुजार
सोच कर कि एक दिन सुनहरे हो जायेंगे इन घोंसलों के तिनके.
पर यह कुछ नया तो नहीं है.
एक हवा चली है शहर में आजकल
जो खींच कर तुम्हारे होश
फेंक देगी तुम्हे किसी बावली भीड़ में
और तू भी चला जायेगा नारे लगाते हुए.
फिर खेलेंगे वो तुम्हारे दिल से
किसी नरपिशाच की तरह.
तुम्हे याद न रहेगा कुछ और इस जहाँ में,
कभी कभी माँ याद आ जायेगी जब पाओगे खुद को नग्न.
इंसान बहुत ही विकासशील जीव है
और तुम उसका एक नमूना.
तभी तो कोई और बताता है कि तुम्हे कैसे जीना है.
इस से अच्छा विकास और क्या होगा.
और इस विकास के लिए तो वोट डाल
तू बता कि तू किसकी मर्जी से जीना चाहता है
बता उन्हें कि वे पसंद हैं तुम्हे सिरमौर की तरह
और तुम्हे मंजूर है उनका तुम्हारे ख्वाबों का रौंदना.
या फिर कह दो कि नहीं चाहिए तुम्हे किसी का विचार.
दे दो मुझे मेरे हिस्से की जमीन और मेरा आसमान
जहाँ हम दो रोटियां उपजा कर सो जायेंगे आस्मां ओढ़ कर.
बच्चों की किलकारियों के साथ नींद बहुत अच्छी आती है.
रात कुछ ऐसे चली गयी जैसे परायी हो
सूरज ऐसे चढ़ रहा ऊपर जैसे महंगाई हो.
निकला न करो घर से अपने ऐ दोस्त
न जाने कहाँ किस मोड़ पर दिल की रुसवाई हो.
पर इंसान एक ही घर, एक ही जगह जिन्दगी देता है गुजार
सोच कर कि एक दिन सुनहरे हो जायेंगे इन घोंसलों के तिनके.
पर यह कुछ नया तो नहीं है.
एक हवा चली है शहर में आजकल
जो खींच कर तुम्हारे होश
फेंक देगी तुम्हे किसी बावली भीड़ में
और तू भी चला जायेगा नारे लगाते हुए.
फिर खेलेंगे वो तुम्हारे दिल से
किसी नरपिशाच की तरह.
तुम्हे याद न रहेगा कुछ और इस जहाँ में,
कभी कभी माँ याद आ जायेगी जब पाओगे खुद को नग्न.
इंसान बहुत ही विकासशील जीव है
और तुम उसका एक नमूना.
तभी तो कोई और बताता है कि तुम्हे कैसे जीना है.
इस से अच्छा विकास और क्या होगा.
और इस विकास के लिए तो वोट डाल
तू बता कि तू किसकी मर्जी से जीना चाहता है
बता उन्हें कि वे पसंद हैं तुम्हे सिरमौर की तरह
और तुम्हे मंजूर है उनका तुम्हारे ख्वाबों का रौंदना.
या फिर कह दो कि नहीं चाहिए तुम्हे किसी का विचार.
दे दो मुझे मेरे हिस्से की जमीन और मेरा आसमान
जहाँ हम दो रोटियां उपजा कर सो जायेंगे आस्मां ओढ़ कर.
बच्चों की किलकारियों के साथ नींद बहुत अच्छी आती है.
रात कुछ ऐसे चली गयी जैसे परायी हो
सूरज ऐसे चढ़ रहा ऊपर जैसे महंगाई हो.
निकला न करो घर से अपने ऐ दोस्त
न जाने कहाँ किस मोड़ पर दिल की रुसवाई हो.
धर्म से टकराए बिना स्त्री मुक्ति सम्भव नही
स्त्री धर्म की व्याख्या करते करते और स्त्री को उसका धर्म सिखाते सिखाते युग बीत गए हैं, उसने सीख भी लिया -हिन्दू स्त्री का जीवन ऐसा हो , मुस्लिम हो तो स्त्री ऐसी होनी चाहिए , ईसाई हो तो स्त्री को ऐसा होना चाहिए.........धर्म और धर्म को बनाने वाला ईश्वर(पता नही कोई कैसे इस बात मे यकीन रख सकता है कि किसी धर्म को ईश्वर ने बनाया है, खैर) और उस धर्म को मानने वाले उसके बन्दे सब मिलकर स्त्री को पाठ पढाते आए हैं।कभी सिखाया गया कि पति परमेश्वर है, कभी सिखाया गया कि स्त्री को पुरुष की अनुगामिनी होना चाहिए , कभी सिखाया गया कि उसे पुरुष की परछाई होना चाहिए,पुरुष के बिना स्त्री के लिए स्वर्ग भी नरक समान है,सभी नाते सूर्य से भी बढकर ताप देने वाले हो जाते हैं........(अयोध्या काण्ड , रामचरितमानस) और इसलिए यदि वह विधवा है या अविवाहित है तो उसका जीना उसे खुद भी दुश्वार लगने लगे दुनिया को तो बाद मे लगे।पतिव्रत धर्म का पाठ जो अनुसूया सीता को पढाती है वह आज तक हिन्दू स्त्री को घोल घोल कर पिलाने की चेष्टा की जाती है(अरण्य काण्ड) अनुसूया कहती हैं - "पति प्रतिकूल जनम जँह जाई ।विधवा होई पाई तरुनाई" माने - जो अपने पति की बात नही मानती वह जहाँ भी जन्म लेती है भरी जवानी मे विधवा हो जाती है।माने जन्म जन्मांतर के डर भी स्त्री को दिखलाए जाते हैं, वह कभी किसी हाल मे पति के खिलाफ न चले रामचरितमानस का पाठ इसी लिए उसे कराया -समझाया जाता है।कीर्तन, मंडली,पाठ , जागरण सभी मे स्त्रियाँ ही बढ चढ कर भाग क्यों लेती हैं - धर्म सीखने की उन्हे ही सबसे ज़्यादा ज़रूरत है?क्योंकि वे दर असल इस योनि मे किसी पाप या दोष के कारण आई हैं ? यही कहता है न धर्म ?
अभी मार्च के हंस मे शीबा असलम फहमी मुस्लिम धर्म के मुल्लाओं के हाथ मे आ जाने से उसके स्त्री विरोधी स्वरूप पर दुखी होकर लिखती हैं - "क्या इन्हें कभी यह खयाल नही आता कि जब एक गैर मुस्लिम औरत एक मुसलमान औरत पर तरस खाते हुए पूछती है कि- 'आपके इस्लाम मे तो औरतों को घर से बाहर निकलकर तालीम व तरक्की हासिल करने की मनाही है' तो उस बेचारी को कैसा लगता होगा? जब कोई यह पूछती है कि आपको तो हमेशा यह डर लगा रहता होगा कि अगर पति नाराज़ हो गया तो तलाक न देदे ,तो कैसा कोड़ा पड़ता होगा आत्मसम्मान पर?जब कोई यह पूछता है कि 'मुसलमान औरत होने के नाते आप तो पति की दूसरी, तीसरी,चौथी शादी के लिए ज़हनी तौर पर तैयार रहती होंगी? तो कैसा खून खौलता होगा हमारा! या जब कोई बड़ी सहानुभूतिपूर्वक कहता है कि 'आप लोगों मे तो पर्दे के कारण लड़कियों को पढाते लिखाते नही , ज़रा बड़ी हुई कि शादी कर दी, तो कितना कमतर महसूस करते हैं हम?'' और जब कोई अश्चर्य से पूछता है कि 'अरे, मुसलमान होकर आप इतनी पढे लिखी हैं और घर से बाहर रह सकती हैं तो फख्र नही अफसोस होता है कि इस्लाम की क्या छवि है सारी दुनिया में " आगे लिखते हैं "औद्योगिक क्रांति के बाद से ही जब सरी दुनिया नए ज्ञान विज्ञान और सामाजिक व्यव्स्था को अपना रही थी , तब जड़ मुल्लाओं ने कौम के लिए शुतुर्मुर्गी नीति तय कर दी........साथ ही साथ (वे) इस्लाम को स्त्री विरोधी बनाकर अधी आबादी को संशय,भय, बगावत की तरफ धकेल रहे हैं "'
मुझे बताइये कि ऐसे मे स्त्री के हाथ जब दुनिया ने धर्म की ज़ंजीरों से जकड़े हों तो वह अधर्मी हुए बिना अपना अस्तित्व कभी पा सकती है?
जब ईश्वर के नाम पर उसे तरह तरह के भय और सज़ाओं के साए में पालतू बना कर रखा जाता हो तो क्या वह नास्तिक हुए बिना कभी अपनी स्वतंत्र पह्चान बना सकती है?
शीबा अपने लेख मे लिखती हैं कि इस्लाम का शुरुआती स्वरूप ऐसा नही था ,उसे सातवीं शताब्दी के बाद पुरुषों ने ही 75 फ़िरक़ों मे बांट दिया , यानि इस्लाम की 75 व्याख्याएँ कर दी गयीं ,सबका अलग नज़रिया है अलग लॉ है , लेकिन एक 76 वीं नयी व्याख्या जो स्त्री करना चाहती है उसके विरोध मे ये सभी एकजुट हैं।
रामचरितमानस भी एक पुरुष द्वारा रची गयी और उसका पाठ हिन्दू घरोंमे जिस तरह से किया जाता है वह सिद्ध करता है कि स्त्री के लिए हिन्दू धर्म क्या स्थिति तय करता है।
पंडिता रमा बाई (भारत की पहली महिला डॉक्टर आनन्दी बाई की रिश्तेदार । आनन्दी की मृत्यु विदेश मे डाक्टरी की पढाई के दौरान हिन्दू जीवन पद्धतियों का कड़ाई से पालन करने के कारण हुई) अपनी पुस्तक "एक हिन्दू स्त्री का जीवन" मे उन अमानवीय स्थितियों का उल्लेख करती हैं जो हिन्दू घरों की स्त्रियों के लिए बनाई गयी थीं जो दर्शाती हैं कि -"इस संसार मे लड़की कुछ नही के बराबर है "
(पृ-47)
जहाँ तक सवाल है कि नास्तिक हो जाने से क्या इससे स्त्री को समाज मे उचित स्थान , मानवीय अधिकार और सुरक्षा मिल जाएगी?क्या वह इससे आज़ाद हो जाएगी?
हाँ , यह एक बेहद ज़रूरी कदम होगा , क्योंकि इससे स्त्री को मूर्ख बनाना आसान नही रह जाएगा , उसे भ्रमित नही किया का सकेगा , कम से कम वह खुद अपनी जड़ताओं , भयों और अन्धविश्वासों से मुक्त हो पाएगी , आत्मविशाव हासिल कर पाएगी , और यही मुक्ति की पहली शर्त होगी कि वह अपनी स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन कर सके , सवाल उठा सके ।हमें स्वीकार करना होगा कि धर्म समाज की मानव की बनाई हुई एक संरचना है जिसमे खामियाँ हैं और इसलिए उसकी पवित्रता मे आँख मून्द कर विश्वास नही किया जा सकता। अपनी अस्मिता के लिए धर्म से टकराए बिना उस पर सन्देह किए बिना कोई रास्ता नही है।स्त्रियों उस पर सन्देह करो !
अभी मार्च के हंस मे शीबा असलम फहमी मुस्लिम धर्म के मुल्लाओं के हाथ मे आ जाने से उसके स्त्री विरोधी स्वरूप पर दुखी होकर लिखती हैं - "क्या इन्हें कभी यह खयाल नही आता कि जब एक गैर मुस्लिम औरत एक मुसलमान औरत पर तरस खाते हुए पूछती है कि- 'आपके इस्लाम मे तो औरतों को घर से बाहर निकलकर तालीम व तरक्की हासिल करने की मनाही है' तो उस बेचारी को कैसा लगता होगा? जब कोई यह पूछती है कि आपको तो हमेशा यह डर लगा रहता होगा कि अगर पति नाराज़ हो गया तो तलाक न देदे ,तो कैसा कोड़ा पड़ता होगा आत्मसम्मान पर?जब कोई यह पूछता है कि 'मुसलमान औरत होने के नाते आप तो पति की दूसरी, तीसरी,चौथी शादी के लिए ज़हनी तौर पर तैयार रहती होंगी? तो कैसा खून खौलता होगा हमारा! या जब कोई बड़ी सहानुभूतिपूर्वक कहता है कि 'आप लोगों मे तो पर्दे के कारण लड़कियों को पढाते लिखाते नही , ज़रा बड़ी हुई कि शादी कर दी, तो कितना कमतर महसूस करते हैं हम?'' और जब कोई अश्चर्य से पूछता है कि 'अरे, मुसलमान होकर आप इतनी पढे लिखी हैं और घर से बाहर रह सकती हैं तो फख्र नही अफसोस होता है कि इस्लाम की क्या छवि है सारी दुनिया में " आगे लिखते हैं "औद्योगिक क्रांति के बाद से ही जब सरी दुनिया नए ज्ञान विज्ञान और सामाजिक व्यव्स्था को अपना रही थी , तब जड़ मुल्लाओं ने कौम के लिए शुतुर्मुर्गी नीति तय कर दी........साथ ही साथ (वे) इस्लाम को स्त्री विरोधी बनाकर अधी आबादी को संशय,भय, बगावत की तरफ धकेल रहे हैं "'
मुझे बताइये कि ऐसे मे स्त्री के हाथ जब दुनिया ने धर्म की ज़ंजीरों से जकड़े हों तो वह अधर्मी हुए बिना अपना अस्तित्व कभी पा सकती है?
जब ईश्वर के नाम पर उसे तरह तरह के भय और सज़ाओं के साए में पालतू बना कर रखा जाता हो तो क्या वह नास्तिक हुए बिना कभी अपनी स्वतंत्र पह्चान बना सकती है?
शीबा अपने लेख मे लिखती हैं कि इस्लाम का शुरुआती स्वरूप ऐसा नही था ,उसे सातवीं शताब्दी के बाद पुरुषों ने ही 75 फ़िरक़ों मे बांट दिया , यानि इस्लाम की 75 व्याख्याएँ कर दी गयीं ,सबका अलग नज़रिया है अलग लॉ है , लेकिन एक 76 वीं नयी व्याख्या जो स्त्री करना चाहती है उसके विरोध मे ये सभी एकजुट हैं।
रामचरितमानस भी एक पुरुष द्वारा रची गयी और उसका पाठ हिन्दू घरोंमे जिस तरह से किया जाता है वह सिद्ध करता है कि स्त्री के लिए हिन्दू धर्म क्या स्थिति तय करता है।
पंडिता रमा बाई (भारत की पहली महिला डॉक्टर आनन्दी बाई की रिश्तेदार । आनन्दी की मृत्यु विदेश मे डाक्टरी की पढाई के दौरान हिन्दू जीवन पद्धतियों का कड़ाई से पालन करने के कारण हुई) अपनी पुस्तक "एक हिन्दू स्त्री का जीवन" मे उन अमानवीय स्थितियों का उल्लेख करती हैं जो हिन्दू घरों की स्त्रियों के लिए बनाई गयी थीं जो दर्शाती हैं कि -"इस संसार मे लड़की कुछ नही के बराबर है "
(पृ-47)
जहाँ तक सवाल है कि नास्तिक हो जाने से क्या इससे स्त्री को समाज मे उचित स्थान , मानवीय अधिकार और सुरक्षा मिल जाएगी?क्या वह इससे आज़ाद हो जाएगी?
हाँ , यह एक बेहद ज़रूरी कदम होगा , क्योंकि इससे स्त्री को मूर्ख बनाना आसान नही रह जाएगा , उसे भ्रमित नही किया का सकेगा , कम से कम वह खुद अपनी जड़ताओं , भयों और अन्धविश्वासों से मुक्त हो पाएगी , आत्मविशाव हासिल कर पाएगी , और यही मुक्ति की पहली शर्त होगी कि वह अपनी स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन कर सके , सवाल उठा सके ।हमें स्वीकार करना होगा कि धर्म समाज की मानव की बनाई हुई एक संरचना है जिसमे खामियाँ हैं और इसलिए उसकी पवित्रता मे आँख मून्द कर विश्वास नही किया जा सकता। अपनी अस्मिता के लिए धर्म से टकराए बिना उस पर सन्देह किए बिना कोई रास्ता नही है।स्त्रियों उस पर सन्देह करो !
MEN ARE BACK - पर आखिर वो गए कहाँ थे ?
पुरुष जितना स्त्री के बारे मे कह सकते हैं , उतना खुद के विषय मे नही कह पाते और पुरुष के लिए पुरुष होना और साबित होना एक महत्वपूर्ण और जोखिम भरा काम है ऐसा मुझे महसूस हुआ है । खैर, रियल मैन या रियल वूमेन जैसा कुछ होना भी चाहिए क्या ? मेरे सामने अभी यही सवाल है जिसकी तलाश है!
पिछले एक दो साल से देख रही हूँ कि शाम के समय आस पास के पार्कों मे कुछ युवा पिता अपने 6 महीने से लेकर 5-6 साल तक के बच्चों को लेकर आते हैं, खेलते हैं,खिलाते हैं।हालांकि वहाँ बच्चों को लेकर आने वाली माताएँ फिर भी संख्या मे उनसे चार गुना होती हैं।तो भी यह देख अच्छा लगता है। एक और अजीब बात पिछले 3- 4 महीने मे मैने तीसरी बार देखी।साल डेढ साल के बच्चे को गोद मे बैठाकर पिता का ड्राइविंग करना।न काम रोका जा सकता है न ही बच्चे को!! मै सोचती हूँ बच्चों को लेकर ममत्व से भर उठना , उनकी देखभाल करना,पत्नी और बच्चों के लिए सम्वेदनशील होना,गृहस्थी के काम मे हाथ बंटाना -क्या यह सब आज के नए पुरुष (जो भले ही संख्या मे बहुत कम हैं)की नयी तस्वीर हैं?
यदि यह बदलते समय का पूर्व चिह्न है तो बहुत अच्छा है, लेकिन फिर भी एक चिंता लगातार बरकरार है।हम अब तक पारम्परिक तौर पर जिसे मर्द , पुरुष या रियल मैन मानते आ रहे हैं यह नयी छवि उससे मेल नही खाती क्योंकि इसमे स्त्रैण गुणों की मिलावट(?) है।फेमिनिन गुण क्या हैं, मस्क्यूलिन क्या हैं यदि हम इसे जानने का प्रयास करें तो एक बेहद खतरनाक बात सामने आती है।
शायद यह विज्ञापन उसमे कुछ मदद करे-
तो आम धारणा यह है कि रियल मैन वह होता है जो है -
बहादुर
ताकतवर
साहसी
निडर
लड़ाका / योद्धा
रौबदार
मुच्छड़
गर्वीला
अहंकारी
दम्भी
आत्मविश्वास से भरपूर
जिसे कोमलता ने छुआ भी न हो
अपनी बात मनवा सकने वाला
जो चाहे उसे पा सकने का माद्दा रखने वाला
गर्दन उठा कर सीना तान कर चलने वाला
जिसे देख लड़कियाँ दीवानी हो जाएँ ऐसे गठे शरीर वाला
कभी किसी के सामने न झुकने वाला
बड़े दिल वाला
दिक्कत अब शुरु होती है।जब आप मस्क्यूलिन गुणों के रूप मे इन्हें कहते हैं तो फेमिनिन या स्त्रैण गुणों के लिए क्या आपको इनके ठीक उलट चलना होता है?शायद यही माना जाता है।इस मानने के हिसाब से देखें तो फेमिनिन गुण हैं -
डरपोक
कमज़ोर/निर्बल
भयभीत/भीरू / कायर
युद्ध की बजाए आत्मसमर्पण
सबकी बात सुनने वाली
बहस न करने वाली
मृदुभाषिणी
झुक कर चलने वाली
संकोची
सेवा भाव , सहजता , कोमलता , विनम्रता से भरपूर
सबका सम्मान करने वाली
अपनी ख्वाहिशें दबा लेने वाली/ आत्मोत्सर्ग / बलिदान करने वाली
जिसे देख पुरुष पाने की इच्छा करे ऐसे रूप वाली
सर्वस्व समर्पण करने वाली
छोटी छोटी बातों मे उलझने वाली
दिक्कत यहाँ और भी बढती है।यह दिखाई दे रहा है कि स्त्रैण और मर्दाने गुणो में विपर्यय , कंट्रास्ट का सम्बन्ध है।इसलिए ये पूरक नही कहे जाएंगे बल्कि उलट कहे जाएंगे।यहाँ और भी दिक्कत है।हिम्मत के मुकाबले आप कोमलता को कैसे श्रेष्ठ गुण कह सकते हैं?इसी तरह गर्व के मुकाबले आप दबने-सिमटने को कैसे श्रेष्ठ मान सकते हैं?इसका मतलब है कि स्त्रैण गुण मर्दाने गुणों से हीन हैं? इसलिए स्त्रियाँ पुरुषों से हीन हैं?इसलिए स्त्री मे मर्दाने गुण हों तो वह "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी " कहा जाएगा और पुरुष मे कोमल गुण हों तो उसके मर्द होने पर शंका जताई जाएगी?
इतना ही नहीं , ये सभी गुण - आप स्वीकारे या न स्वीकारें - समाज का तय किया हुआ मानक है , स्टैंडर्ड है और इस मानक से ज़रा भी विचलन हुआ कि व्यक्ति उपहास,उपेक्षा या विरोध का पात्र बन जाता है।लक्ष्मी बाई की बात जाने दें,साधारण स्त्री को आप बहस करता, तर्क वितर्क करते, मुखर होते,गाली देते देखते हैं तो असहज महसूस करते हैं, इसी मापदण्ड के अनुसार ही।
दर असल स्त्री पुरुष गुणों मे विपर्यय मानना ही गलत दृष्टि है, हमे स्वीकार करना चाहिए कि इन सभी गुणों का इधर से उधर आना जाना सम्भव है सामान्य है, इनका कम ज़्यादा होना भी स्वाभाविक , सामान्य बात है।स्त्री भी लड़ाका , योद्धा, अहंकारी, किसी के सामने न झुकने वाली है तो सामान्य है।पुरुष भी सम्वेदनशील,विनम्र,सबकी सुनने वाला,संकोची है तो यह सामान्य है।विरोध देखना हमारा दृष्टि दोष है।
लेकिन जो विज्ञापन हमने अभी देखा क्या वह बदलते हुए पुरुष की तस्वीर को धक्का नही पहुँचाता ? men are back ? माने पुरुष वापस आ गया है !! कौन सा पुरुष वापस आया है ? आखिर वह कहाँ चला गया था? कल की पोस्ट पर कोई अनाम इसी आशय का एक लिंक छोड़ गया था।लिंक काम का था।वहाँ का लेख इसी तरह की बातों पर विचार व्यक्त करता है।
क्या यह पुरुषों के लिए एक अस्मिता संकट आइडेंटिटी क्राइसेस की तरह देखा जाए? वे बदल रहे हैं लेकिन चिंतित हैं कि उनकी असली पहचान - एक माचो मैन की पहचान विलीन हो रही है।मेट्रोसेक्शुअल मैन इस पह्चान के संकट को और भी बढावा दे रहा है।मेट्रोसेक्शुअल वह पुरुष है जो फेमिनिन गुणों से परहेज़ नही करता।चाहे वह कान मे बाली धारण करना हो या लम्बे बाल रखना।सम्भवत: इसी संकट के चलते मेन आर बैक जैसे फ्रेज़ेज़ का इस्तेमाल विज्ञापन कम्पनियों को सटीक प्रतीत होता है।
दिल्ली पुलिस जब छेड़खानी सम्बन्धी विज्ञापन बीते सालों मे छाप रही थी तो वह भी ऐसे मर्दों को पुकार रही थी जो आकर छिड़ती हुई अबला की रक्षा करें।तस्वीर मे छेड़खाने करते कुछ युवक हैं और बाकी चुपचाप खड़े कुछ लोग और विज्ञापन कहता था कि - लगता है इनमे कोई मर्द नही है, वर्ना ऐसा नही होता।क्या यह चिन्ता वाजिब है कि असली मर्द लुप्त हो रहा है जबकि मर्दानगी का एक लक्षण-प्रकाश झा की फिल्म दिल दोस्ती वाला भी है और वह फल फूल रहा है और एक लक्षण साहस-बहादुरी,अपनी बात का पक्का होने वाला भी है जो घट रहा है।
ऐसे मे जबकि पुरुष भीतर माचो मैन नही रहा है लेकिन बाहर फिर भी वह वही "मर्द" दिखते रहने की चाहत लिए हुए है (ऐसे सिगरेट , ऐसी बाइक , ऐसी कार या कूल लुक्स या ऐब्स के सहारे जिन्हे पारम्परिक शब्दावली मे मैनली कहा जाएगा) तो ऐसे मे बदलता हुआ पुरुष क्या वाकई स्त्री के लिए सच्चा हमदर्द , सच्चा साथी ?क्या यह नया कनफ्यूज़्ड साथी स्त्री मुक्ति के मार्ग मे सच्चा हम सफर बन सकेगा?पत्नी उसके बराबर कमाती है इसलिए बच्चों को तैयार करना,उन्हें घुमाना-खेलाना-खिलाना, सब्ज़ी लाना उनकी मजबूरी है ; इसलिए उसके पुरुत्व की अभिव्यक्ति अन्य स्थानों पर यदा कदा होती है? या बेहतर पिता बनकर वे अपने लिए पुरुषत्व की नयी परिभाषा गढ रहे हैं?
पिछले एक दो साल से देख रही हूँ कि शाम के समय आस पास के पार्कों मे कुछ युवा पिता अपने 6 महीने से लेकर 5-6 साल तक के बच्चों को लेकर आते हैं, खेलते हैं,खिलाते हैं।हालांकि वहाँ बच्चों को लेकर आने वाली माताएँ फिर भी संख्या मे उनसे चार गुना होती हैं।तो भी यह देख अच्छा लगता है। एक और अजीब बात पिछले 3- 4 महीने मे मैने तीसरी बार देखी।साल डेढ साल के बच्चे को गोद मे बैठाकर पिता का ड्राइविंग करना।न काम रोका जा सकता है न ही बच्चे को!! मै सोचती हूँ बच्चों को लेकर ममत्व से भर उठना , उनकी देखभाल करना,पत्नी और बच्चों के लिए सम्वेदनशील होना,गृहस्थी के काम मे हाथ बंटाना -क्या यह सब आज के नए पुरुष (जो भले ही संख्या मे बहुत कम हैं)की नयी तस्वीर हैं?
यदि यह बदलते समय का पूर्व चिह्न है तो बहुत अच्छा है, लेकिन फिर भी एक चिंता लगातार बरकरार है।हम अब तक पारम्परिक तौर पर जिसे मर्द , पुरुष या रियल मैन मानते आ रहे हैं यह नयी छवि उससे मेल नही खाती क्योंकि इसमे स्त्रैण गुणों की मिलावट(?) है।फेमिनिन गुण क्या हैं, मस्क्यूलिन क्या हैं यदि हम इसे जानने का प्रयास करें तो एक बेहद खतरनाक बात सामने आती है।
शायद यह विज्ञापन उसमे कुछ मदद करे-
तो आम धारणा यह है कि रियल मैन वह होता है जो है -
बहादुर
ताकतवर
साहसी
निडर
लड़ाका / योद्धा
रौबदार
मुच्छड़
गर्वीला
अहंकारी
दम्भी
आत्मविश्वास से भरपूर
जिसे कोमलता ने छुआ भी न हो
अपनी बात मनवा सकने वाला
जो चाहे उसे पा सकने का माद्दा रखने वाला
गर्दन उठा कर सीना तान कर चलने वाला
जिसे देख लड़कियाँ दीवानी हो जाएँ ऐसे गठे शरीर वाला
कभी किसी के सामने न झुकने वाला
बड़े दिल वाला
दिक्कत अब शुरु होती है।जब आप मस्क्यूलिन गुणों के रूप मे इन्हें कहते हैं तो फेमिनिन या स्त्रैण गुणों के लिए क्या आपको इनके ठीक उलट चलना होता है?शायद यही माना जाता है।इस मानने के हिसाब से देखें तो फेमिनिन गुण हैं -
डरपोक
कमज़ोर/निर्बल
भयभीत/भीरू / कायर
युद्ध की बजाए आत्मसमर्पण
सबकी बात सुनने वाली
बहस न करने वाली
मृदुभाषिणी
झुक कर चलने वाली
संकोची
सेवा भाव , सहजता , कोमलता , विनम्रता से भरपूर
सबका सम्मान करने वाली
अपनी ख्वाहिशें दबा लेने वाली/ आत्मोत्सर्ग / बलिदान करने वाली
जिसे देख पुरुष पाने की इच्छा करे ऐसे रूप वाली
सर्वस्व समर्पण करने वाली
छोटी छोटी बातों मे उलझने वाली
दिक्कत यहाँ और भी बढती है।यह दिखाई दे रहा है कि स्त्रैण और मर्दाने गुणो में विपर्यय , कंट्रास्ट का सम्बन्ध है।इसलिए ये पूरक नही कहे जाएंगे बल्कि उलट कहे जाएंगे।यहाँ और भी दिक्कत है।हिम्मत के मुकाबले आप कोमलता को कैसे श्रेष्ठ गुण कह सकते हैं?इसी तरह गर्व के मुकाबले आप दबने-सिमटने को कैसे श्रेष्ठ मान सकते हैं?इसका मतलब है कि स्त्रैण गुण मर्दाने गुणों से हीन हैं? इसलिए स्त्रियाँ पुरुषों से हीन हैं?इसलिए स्त्री मे मर्दाने गुण हों तो वह "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी " कहा जाएगा और पुरुष मे कोमल गुण हों तो उसके मर्द होने पर शंका जताई जाएगी?
इतना ही नहीं , ये सभी गुण - आप स्वीकारे या न स्वीकारें - समाज का तय किया हुआ मानक है , स्टैंडर्ड है और इस मानक से ज़रा भी विचलन हुआ कि व्यक्ति उपहास,उपेक्षा या विरोध का पात्र बन जाता है।लक्ष्मी बाई की बात जाने दें,साधारण स्त्री को आप बहस करता, तर्क वितर्क करते, मुखर होते,गाली देते देखते हैं तो असहज महसूस करते हैं, इसी मापदण्ड के अनुसार ही।
दर असल स्त्री पुरुष गुणों मे विपर्यय मानना ही गलत दृष्टि है, हमे स्वीकार करना चाहिए कि इन सभी गुणों का इधर से उधर आना जाना सम्भव है सामान्य है, इनका कम ज़्यादा होना भी स्वाभाविक , सामान्य बात है।स्त्री भी लड़ाका , योद्धा, अहंकारी, किसी के सामने न झुकने वाली है तो सामान्य है।पुरुष भी सम्वेदनशील,विनम्र,सबकी सुनने वाला,संकोची है तो यह सामान्य है।विरोध देखना हमारा दृष्टि दोष है।
लेकिन जो विज्ञापन हमने अभी देखा क्या वह बदलते हुए पुरुष की तस्वीर को धक्का नही पहुँचाता ? men are back ? माने पुरुष वापस आ गया है !! कौन सा पुरुष वापस आया है ? आखिर वह कहाँ चला गया था? कल की पोस्ट पर कोई अनाम इसी आशय का एक लिंक छोड़ गया था।लिंक काम का था।वहाँ का लेख इसी तरह की बातों पर विचार व्यक्त करता है।
क्या यह पुरुषों के लिए एक अस्मिता संकट आइडेंटिटी क्राइसेस की तरह देखा जाए? वे बदल रहे हैं लेकिन चिंतित हैं कि उनकी असली पहचान - एक माचो मैन की पहचान विलीन हो रही है।मेट्रोसेक्शुअल मैन इस पह्चान के संकट को और भी बढावा दे रहा है।मेट्रोसेक्शुअल वह पुरुष है जो फेमिनिन गुणों से परहेज़ नही करता।चाहे वह कान मे बाली धारण करना हो या लम्बे बाल रखना।सम्भवत: इसी संकट के चलते मेन आर बैक जैसे फ्रेज़ेज़ का इस्तेमाल विज्ञापन कम्पनियों को सटीक प्रतीत होता है।
दिल्ली पुलिस जब छेड़खानी सम्बन्धी विज्ञापन बीते सालों मे छाप रही थी तो वह भी ऐसे मर्दों को पुकार रही थी जो आकर छिड़ती हुई अबला की रक्षा करें।तस्वीर मे छेड़खाने करते कुछ युवक हैं और बाकी चुपचाप खड़े कुछ लोग और विज्ञापन कहता था कि - लगता है इनमे कोई मर्द नही है, वर्ना ऐसा नही होता।क्या यह चिन्ता वाजिब है कि असली मर्द लुप्त हो रहा है जबकि मर्दानगी का एक लक्षण-प्रकाश झा की फिल्म दिल दोस्ती वाला भी है और वह फल फूल रहा है और एक लक्षण साहस-बहादुरी,अपनी बात का पक्का होने वाला भी है जो घट रहा है।
ऐसे मे जबकि पुरुष भीतर माचो मैन नही रहा है लेकिन बाहर फिर भी वह वही "मर्द" दिखते रहने की चाहत लिए हुए है (ऐसे सिगरेट , ऐसी बाइक , ऐसी कार या कूल लुक्स या ऐब्स के सहारे जिन्हे पारम्परिक शब्दावली मे मैनली कहा जाएगा) तो ऐसे मे बदलता हुआ पुरुष क्या वाकई स्त्री के लिए सच्चा हमदर्द , सच्चा साथी ?क्या यह नया कनफ्यूज़्ड साथी स्त्री मुक्ति के मार्ग मे सच्चा हम सफर बन सकेगा?पत्नी उसके बराबर कमाती है इसलिए बच्चों को तैयार करना,उन्हें घुमाना-खेलाना-खिलाना, सब्ज़ी लाना उनकी मजबूरी है ; इसलिए उसके पुरुत्व की अभिव्यक्ति अन्य स्थानों पर यदा कदा होती है? या बेहतर पिता बनकर वे अपने लिए पुरुषत्व की नयी परिभाषा गढ रहे हैं?
Subscribe to:
Posts (Atom)