स्त्री धर्म की व्याख्या करते करते और स्त्री को उसका धर्म सिखाते सिखाते युग बीत गए हैं, उसने सीख भी लिया -हिन्दू स्त्री का जीवन ऐसा हो , मुस्लिम हो तो स्त्री ऐसी होनी चाहिए , ईसाई हो तो स्त्री को ऐसा होना चाहिए.........धर्म और धर्म को बनाने वाला ईश्वर(पता नही कोई कैसे इस बात मे यकीन रख सकता है कि किसी धर्म को ईश्वर ने बनाया है, खैर) और उस धर्म को मानने वाले उसके बन्दे सब मिलकर स्त्री को पाठ पढाते आए हैं।कभी सिखाया गया कि पति परमेश्वर है, कभी सिखाया गया कि स्त्री को पुरुष की अनुगामिनी होना चाहिए , कभी सिखाया गया कि उसे पुरुष की परछाई होना चाहिए,पुरुष के बिना स्त्री के लिए स्वर्ग भी नरक समान है,सभी नाते सूर्य से भी बढकर ताप देने वाले हो जाते हैं........(अयोध्या काण्ड , रामचरितमानस) और इसलिए यदि वह विधवा है या अविवाहित है तो उसका जीना उसे खुद भी दुश्वार लगने लगे दुनिया को तो बाद मे लगे।पतिव्रत धर्म का पाठ जो अनुसूया सीता को पढाती है वह आज तक हिन्दू स्त्री को घोल घोल कर पिलाने की चेष्टा की जाती है(अरण्य काण्ड) अनुसूया कहती हैं - "पति प्रतिकूल जनम जँह जाई ।विधवा होई पाई तरुनाई" माने - जो अपने पति की बात नही मानती वह जहाँ भी जन्म लेती है भरी जवानी मे विधवा हो जाती है।माने जन्म जन्मांतर के डर भी स्त्री को दिखलाए जाते हैं, वह कभी किसी हाल मे पति के खिलाफ न चले रामचरितमानस का पाठ इसी लिए उसे कराया -समझाया जाता है।कीर्तन, मंडली,पाठ , जागरण सभी मे स्त्रियाँ ही बढ चढ कर भाग क्यों लेती हैं - धर्म सीखने की उन्हे ही सबसे ज़्यादा ज़रूरत है?क्योंकि वे दर असल इस योनि मे किसी पाप या दोष के कारण आई हैं ? यही कहता है न धर्म ?
अभी मार्च के हंस मे शीबा असलम फहमी मुस्लिम धर्म के मुल्लाओं के हाथ मे आ जाने से उसके स्त्री विरोधी स्वरूप पर दुखी होकर लिखती हैं - "क्या इन्हें कभी यह खयाल नही आता कि जब एक गैर मुस्लिम औरत एक मुसलमान औरत पर तरस खाते हुए पूछती है कि- 'आपके इस्लाम मे तो औरतों को घर से बाहर निकलकर तालीम व तरक्की हासिल करने की मनाही है' तो उस बेचारी को कैसा लगता होगा? जब कोई यह पूछती है कि आपको तो हमेशा यह डर लगा रहता होगा कि अगर पति नाराज़ हो गया तो तलाक न देदे ,तो कैसा कोड़ा पड़ता होगा आत्मसम्मान पर?जब कोई यह पूछता है कि 'मुसलमान औरत होने के नाते आप तो पति की दूसरी, तीसरी,चौथी शादी के लिए ज़हनी तौर पर तैयार रहती होंगी? तो कैसा खून खौलता होगा हमारा! या जब कोई बड़ी सहानुभूतिपूर्वक कहता है कि 'आप लोगों मे तो पर्दे के कारण लड़कियों को पढाते लिखाते नही , ज़रा बड़ी हुई कि शादी कर दी, तो कितना कमतर महसूस करते हैं हम?'' और जब कोई अश्चर्य से पूछता है कि 'अरे, मुसलमान होकर आप इतनी पढे लिखी हैं और घर से बाहर रह सकती हैं तो फख्र नही अफसोस होता है कि इस्लाम की क्या छवि है सारी दुनिया में " आगे लिखते हैं "औद्योगिक क्रांति के बाद से ही जब सरी दुनिया नए ज्ञान विज्ञान और सामाजिक व्यव्स्था को अपना रही थी , तब जड़ मुल्लाओं ने कौम के लिए शुतुर्मुर्गी नीति तय कर दी........साथ ही साथ (वे) इस्लाम को स्त्री विरोधी बनाकर अधी आबादी को संशय,भय, बगावत की तरफ धकेल रहे हैं "'
मुझे बताइये कि ऐसे मे स्त्री के हाथ जब दुनिया ने धर्म की ज़ंजीरों से जकड़े हों तो वह अधर्मी हुए बिना अपना अस्तित्व कभी पा सकती है?
जब ईश्वर के नाम पर उसे तरह तरह के भय और सज़ाओं के साए में पालतू बना कर रखा जाता हो तो क्या वह नास्तिक हुए बिना कभी अपनी स्वतंत्र पह्चान बना सकती है?
शीबा अपने लेख मे लिखती हैं कि इस्लाम का शुरुआती स्वरूप ऐसा नही था ,उसे सातवीं शताब्दी के बाद पुरुषों ने ही 75 फ़िरक़ों मे बांट दिया , यानि इस्लाम की 75 व्याख्याएँ कर दी गयीं ,सबका अलग नज़रिया है अलग लॉ है , लेकिन एक 76 वीं नयी व्याख्या जो स्त्री करना चाहती है उसके विरोध मे ये सभी एकजुट हैं।
रामचरितमानस भी एक पुरुष द्वारा रची गयी और उसका पाठ हिन्दू घरोंमे जिस तरह से किया जाता है वह सिद्ध करता है कि स्त्री के लिए हिन्दू धर्म क्या स्थिति तय करता है।
पंडिता रमा बाई (भारत की पहली महिला डॉक्टर आनन्दी बाई की रिश्तेदार । आनन्दी की मृत्यु विदेश मे डाक्टरी की पढाई के दौरान हिन्दू जीवन पद्धतियों का कड़ाई से पालन करने के कारण हुई) अपनी पुस्तक "एक हिन्दू स्त्री का जीवन" मे उन अमानवीय स्थितियों का उल्लेख करती हैं जो हिन्दू घरों की स्त्रियों के लिए बनाई गयी थीं जो दर्शाती हैं कि -"इस संसार मे लड़की कुछ नही के बराबर है "
(पृ-47)
जहाँ तक सवाल है कि नास्तिक हो जाने से क्या इससे स्त्री को समाज मे उचित स्थान , मानवीय अधिकार और सुरक्षा मिल जाएगी?क्या वह इससे आज़ाद हो जाएगी?
हाँ , यह एक बेहद ज़रूरी कदम होगा , क्योंकि इससे स्त्री को मूर्ख बनाना आसान नही रह जाएगा , उसे भ्रमित नही किया का सकेगा , कम से कम वह खुद अपनी जड़ताओं , भयों और अन्धविश्वासों से मुक्त हो पाएगी , आत्मविशाव हासिल कर पाएगी , और यही मुक्ति की पहली शर्त होगी कि वह अपनी स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन कर सके , सवाल उठा सके ।हमें स्वीकार करना होगा कि धर्म समाज की मानव की बनाई हुई एक संरचना है जिसमे खामियाँ हैं और इसलिए उसकी पवित्रता मे आँख मून्द कर विश्वास नही किया जा सकता। अपनी अस्मिता के लिए धर्म से टकराए बिना उस पर सन्देह किए बिना कोई रास्ता नही है।स्त्रियों उस पर सन्देह करो !
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1 comment:
shabdon ka farq ho sakta hai,hbasha aap hi ki bolti thi mai bhi.jb se sochna shuru kiya tabhi se dharm per sandeh bhi khud hi paida hone laga.aur aaj thok baja kr kh sakti hun k aapk shabd "dharm se takraye bina stri mukti sambhav nahi"bilkul mere bheetr ki aawaz h.lekin kahna jitn seedha h ise jeena utna hi khatarnak h.esi soch rakhne k badle me aapko poore k poore samaj ka n kewal bahishkar balki pratdna jhelni padti h.kyonki pragtisheel kahe jane wale logon me bhi dharm ko lekr duragrah bahut gahre hn.maine bhi pragtisheel kahlaye jane wale ek aadmi se apni marzi se shadi ki.jante hn!akser usne raton ko mujhe bhoot se darane ki koshish ki h.ye mazak nahi tha balki sachmuch usne esa mahol banaya jaise aatma uske bheeter aa gai ho,ye sb sirf isliye ki mai der jau aur 'bhagwan ko man ne lagun.der to mai wakai gai thi lekin,der kr kisi ko poojne lagun ye baat mujhe katai samajh me nahi aai(jaisi ki uski ichchha thi).aur bhi tamam tarah k dabav hn.meri bolti ab band ho gai h.lekin soch kumbakht khatm nahin hoti.kya mai atiwadi hun?
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